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World Sleep Day 2026: मोबाइल और सोशल मीडिया से युवाओं की उड़ रही नींद, अवसाद और आत्महत्या का खतरा बढ़ा

शोध में खुलासा: 60-70% किशोर पर्याप्त नींद से वंचित, सात घंटे से कम सोने वालों में आक्रामक व्यवहार और मानसिक समस्याएं अधिक
 

 

नई दिल्ली। डिजिटल दौर में मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और देर रात तक स्क्रीन के इस्तेमाल ने युवाओं की नींद पर गंभीर असर डालना शुरू कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार कम नींद लेने की आदत युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है। इसका सीधा संबंध अवसाद, आक्रामक व्यवहार और आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति से जोड़ा जा रहा है।

वर्ल्ड स्लीप डे 2026 के मौके पर जारी आंकड़ों और विशेषज्ञों की चेतावनी ने इस समस्या की गंभीरता को और स्पष्ट कर दिया है। नींद के महत्व को लेकर जागरूकता बढ़ाने के लिए विभिन्न स्वास्थ्य संगठनों ने बताया कि दुनिया में करीब 60 से 70 प्रतिशत किशोर पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहे हैं।

आठ घंटे से भी कम सोते हैं छात्र

अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) के अनुसार लगभग 73 प्रतिशत हाई स्कूल के छात्र स्कूल के दिनों में आठ घंटे से भी कम सोते हैं।
भारत में भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं है। अलग-अलग अध्ययनों में सामने आया है कि 80 से 90 प्रतिशत किशोर किसी न किसी स्तर पर नींद की कमी का सामना कर रहे हैं। कई सर्वेक्षणों में यह भी पाया गया कि करीब 64 प्रतिशत किशोर रोजाना आठ घंटे या उससे भी कम नींद लेते हैं, जबकि विशेषज्ञों के अनुसार किशोरों के लिए 8 से 10 घंटे की नींद जरूरी मानी जाती है।


कम नींद से बढ़ता है आक्रामक व्यवहार

विशेषज्ञों के अनुसार कम नींद का असर युवाओं के व्यवहार पर भी साफ दिखाई देता है। शोध बताते हैं कि जो किशोर रात में सात घंटे से कम सोते हैं, उनमें आक्रामक व्यवहार की संभावना आठ घंटे या उससे अधिक सोने वालों की तुलना में लगभग 1.5 से 2 गुना अधिक होती है।
स्कूल आधारित सर्वेक्षणों में यह भी सामने आया है कि नींद की कमी से जूझ रहे किशोरों में झगड़े और बुलिंग की घटनाएं 30 से 40 प्रतिशत तक अधिक देखी जाती हैं।

आत्महत्या के खतरे से भी जुड़ा संबंध

अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि नींद की कमी और आत्महत्या के विचारों के बीच संबंध मौजूद है। जिन लोगों को नींद से जुड़ी समस्याएं होती हैं, उनमें आत्महत्या के विचार या प्रयास का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में 2 से 3 गुना अधिक हो सकता है।

भारत में बढ़ते आत्महत्या के आंकड़े चिंता बढ़ाते

देश में बढ़ते आत्महत्या के मामले भी इस समस्या को और गंभीर बना रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार भारत में 2013 में 1.34 लाख आत्महत्या के मामले दर्ज हुए थे, जो 2023 में बढ़कर 1.71 लाख से अधिक हो गए।

इसी अवधि में छात्र आत्महत्याओं की संख्या 8,423 से बढ़कर 13,892 तक पहुंच गई, जो करीब 65 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है।

विशेषज्ञों की सलाह

कलकत्ता स्लीप सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. उत्तम अग्रवाल का कहना है कि अच्छी गुणवत्ता वाली नींद संपूर्ण स्वास्थ्य की बुनियाद है। उनके अनुसार अगर लोग अपनी दिनचर्या में छोटे-छोटे बदलाव करें, जैसे सोने से पहले स्क्रीन का इस्तेमाल कम करना, नियमित समय पर सोना और उठना तथा संतुलित जीवनशैली अपनाना, तो नींद से जुड़ी कई समस्याओं से बचा जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में यह समाज के लिए एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन सकती है।