SC का बड़ा फैसला: मतदाता सूची का 'SIR' चुनाव आयोग का अधिकार, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाओं को किया खारिज
सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने सुनाया फैसला, नागरिकता की जांच पर कोर्ट का रुख साफ
Bhadaini Mirror Desk: देश में निष्पक्ष चुनाव कराने और मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR - Special Intensive Revision) को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए साफ किया है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह संवैधानिक है और एसआईआर कराना चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है.
सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने सुनाया फैसला
मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इस साल की शुरुआत में 29 जनवरी को लंबी सुनवाई के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे बुधवार को सुनाया गया.
अदालत ने अपने फैसले में मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें कहीं:
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शक्तियों का सही इस्तेमाल: चुनाव आयोग ने अपनी संवैधानिक शक्तियों का कोई दुरुपयोग नहीं किया है और न ही एसआईआर प्रक्रिया के दौरान नियमों के खिलाफ जाकर किसी मतदाता का नाम काटा गया है.
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संवैधानिक अधिकार: संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 के तहत चुनाव आयोग को एसआईआर कराने की पूरी शक्ति प्राप्त है. यह नहीं कहा जा सकता कि आयोग ने अपनी वैधानिक सीमाओं के बाहर जाकर काम किया है.
नागरिकता की जांच पर कोर्ट का रुख साफ
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें दावा किया गया था कि यह प्रक्रिया 'लाल बाबू हुसैन मामले' के फैसले का उल्लंघन करती है.
कोर्ट की अहम टिप्पणी: "चुनाव आयोग के पास यह तय करने का अधिकार तो नहीं है कि कौन भारत का नागरिक है और कौन नहीं, लेकिन मतदाता सूची को दुरुस्त करने के उद्देश्य से नागरिकता से जुड़े सवालों की जांच करना उसके अधिकार क्षेत्र में आता है. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 16 के तहत आयोग के पास इसका वैधानिक अधिकार है."
अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि आयोग को लगता है कि कोई व्यक्ति वैधानिक शर्तें पूरी नहीं करता, तो वह मामला सक्षम प्राधिकारी को भेज सकता है. नाम हटाने का अंतिम फैसला उसी सक्षम प्राधिकारी के निर्णय पर निर्भर करेगा.
विवाद की मुख्य वजह क्या थी?
यह पूरा विवाद पिछले साल जून में तब शुरू हुआ था जब चुनाव आयोग ने बिहार में एसआईआर अभियान की शुरुआत की थी. बाद में इसे पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु सहित कई राज्यों में लागू किया गया.
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याचिकाकर्ताओं के बड़े नाम: इस अभियान के खिलाफ लोकतांत्रिक सुधार संघ (ADR), योगेंद्र यादव, महुआ मोइत्रा, मनोज झा, केसी वेणुगोपाल और सुप्रिया सुले जैसे बड़े नेताओं व संगठनों ने याचिकाएं दायर की थीं.
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पारिवारिक संबंध साबित करने की शर्त: विवाद का मुख्य कारण चुनाव आयोग की वह शर्त थी, जिसमें कहा गया था कि जिन मतदाताओं का नाम 2002 या 2003 की वोटर लिस्ट में नहीं था, उन्हें उन सूचियों में दर्ज किसी व्यक्ति से अपना पारिवारिक संबंध साबित करना होगा.
गरीबों और प्रवासियों के हक की दलील
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में तर्क दिया था कि इस कड़ी शर्त के कारण गरीब, प्रवासी और समाज के हाशिए पर रहने वाले लोग अपने मताधिकार से वंचित हो सकते हैं, क्योंकि उनके पास इतने पुराने रिकॉर्ड या दस्तावेजी प्रमाण मिलना बेहद मुश्किल है.
हालांकि, सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने और प्रभावित मतदाताओं को राहत देने के लिए कई अंतरिम निर्देश भी जारी किए थे. इसी क्रम में सत्यापन की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए आधिकारिक पहचान पत्रों और जरूरी दस्तावेजों की सूची का दायरा भी बढ़ाया गया था, ताकि कोई भी पात्र नागरिक मतदान से न छूटे.