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'वंदे मातरम्' की सभी 6 पंक्तियां गाने की अनिवार्यता को चुनौती: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब, कहा- 'धार्मिक आस्था पर दंडात्मक कार्रवाई गलत'

कर्नाटक संगीतकार टी.एम. कृष्णा की याचिका पर सुनवाई; CJI पीठ ने कहा- धार्मिक कारणों से राष्ट्रगीत न गाने पर दंडात्मक कार्रवाई नहीं हो सकती

 

भदैनी मिरर डेस्क: राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) अधिनियम, 2026 और गृह मंत्रालय के उन निर्देशों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है, जिसमें सरकारी व आधिकारिक कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम्' के सभी छह अंतरों (Stanzas) के गायन को अनिवार्य किया गया है।

कर्नाटक के मशहूर संगीतकार टी.एम. कृष्णा द्वारा दायर इस याचिका पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई की।

'राष्ट्रीय गीत तय करना कोर्ट का काम नहीं, पर अधिकारों की रक्षा जरूरी'

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मौखिक रूप से स्पष्ट किया कि अदालत यह तय करने के लिए नहीं बैठी है कि "राष्ट्रीय गीत" क्या होना चाहिए, क्योंकि यह तय करना राज्य (सरकार) का क्षेत्राधिकार है। हालांकि, कोर्ट इस संवैधानिक सवाल की जांच जरूर करेगा कि क्या धार्मिक या अंतरात्मा के आधार पर राष्ट्रगीत न गाने वाले व्यक्ति के अधिकारों को संविधान के तहत संरक्षण प्राप्त है या नहीं।

पीठ ने प्रसिद्ध 'बिजोई इमैनुएल बनाम केरल राज्य' (Bijoe Emmanuel Case) फैसले के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति धार्मिक या अंतरात्मा के कारणों से राष्ट्रगीत नहीं गाता है, तो उस पर दंडात्मक या आपराधिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।

क्या है 2026 के संशोधन में विवादित प्रावधान?

याचिका में Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Act, 2026 की संशोधित धारा 3 को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है।

  • 3 साल की जेल का प्रावधान: नए संशोधन के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत के गायन को रोकता है या उस दौरान विघ्न (Disturbance) डालता है, तो उसे 3 वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है।

  • गृह मंत्रालय का निर्देश: याचिकाकर्ता का कहना है कि गृह मंत्रालय के निर्देशों और इस नए आपराधिक प्रावधान को मिलाकर पढ़ने पर वंदे मातरम् के पूरे छह अंतरों का गायन व्यावहारिक रूप से अनिवार्य हो जाता है।

अंतिम 4 अंतरों पर क्यों उठाई गई आपत्ति?

टी.एम. कृष्णा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने तर्क दिया कि वंदे मातरम् के अंतिम चार अंतरों में हिंदू देवी-देवताओं (दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती) के संदर्भ शामिल हैं। ऐसे में सभी छह अंतरों को अनिवार्य रूप से गाने के लिए बाध्य करना नागरिकों के मौलिक अधिकारों—विशेष रूप से अनुच्छेद 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 25(1) (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन है।

याचिका में ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया गया कि 1937 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी मुस्लिम सदस्यों की आपत्तियों के बाद राष्ट्रगीत के रूप में केवल पहले दो अंतरों को ही राष्ट्रीय सभाओं में गाने का निर्णय लिया था, जिसे पंडित जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और रवींद्रनाथ टैगोर का समर्थन प्राप्त था।

सॉलिसीटर जनरल की टिप्पणी पर बवाल

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका पर कड़ा विरोध जताते हुए कहा कि "धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा को इतना संकीर्ण नहीं किया जा सकता।" इसके बाद उन्होंने बहस के दौरान "नक्सलाइट" (Naxalite) शब्द का इस्तेमाल किया, जिस पर याचिकाकर्ता के वकील डॉ. मुरलीधर ने कड़ा ऐतराज जताया और टिप्पणी वापस लेने की मांग की। हालांकि सॉलिसिटर जनरल ने टिप्पणी वापस लेने से इनकार कर दिया।

आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस संवैधानिक मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि जब तक इस मामले में अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक नागरिकों को किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम संरक्षण दिया जाए।