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UGC नये नियमों को चुनौती देनेवाली याचिका पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट तैयार, CJI ने कहा-हमें पता है क्या हो रहा है

देश भर में विरोध में बीजेपी के लोग भी शामिल, मंथन में जुटी सरकार

 
याचिका में कहा गया-इस फ्रेमवर्क से गैर आरक्षित वर्गों के खिलाफ दुश्मनी को बढ़ावा मिलेगा

नई दिल्ली। यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट तैयार हो गया है। शीर्ष न्यायालय ने बुधवार को इस याचिका को सूचीबद्ध करने की मंजूरी दे दी है। याचिका में कहा गया है कि इस रेगुलेशन में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा गैर-समावेशी है और यह कुछ खास कैटेगरी को सुरक्षा से बाहर रखते हैं। नए नियमों के तहत सामान्य वर्ग से आने वाले छात्रों को शिकायत निवारण जैसी सुरक्षा नहीं मिलेगी। वहीं, देशभर के केंद्र की मोदी सरकार के प्रति बढ़ते विरोध को देखते हुए सरकार ने भी मंथन शुरू कर दिया है और जानकारों से इस पर परामर्श लिया जा रहा है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने एक वकील की दलीलों पर ध्यान दिया। अधिवक्ता ने कहाकि इस रेगुलेशन से सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव की संभावना है। मेरा मामला ‘राहुल दीवान और अन्य बनाम यूनियन’ है। तब सीजेआई ने कहाकि हमें पता है कि क्या हो रहा है। सुनिश्चित करें कि कमियां दूर हो जांय, इसे हम लिस्ट करेंगे।

आपको बता दें कि यूजीसी के ये नए रेगुलेशन सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को भेदभाव की शिकायतों को देखने और समानता को बढ़ावा देने के लिए ‘इक्विटी कमेटियां’ बनाने का आदेश देते हैं। सरकार ने इसे 13 जनवरी को जारी किया था। साथ ही सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में इसे लागू करने के निर्देश दिए गए थे। नियमों की अनदेखी पर संस्थान के खिलाफ कार्रवाई की बात भी कही गई थी। इसके बाद से विरोध प्रदर्शन शुरू हो गये। यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन रेगुलेशन, 2026 में यह अनिवार्य किया गया है कि इन कमेटियों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), दिव्यांग व्यक्ति और महिलाएं शामिल होनी चाहिए। याचिका में इस रेगुलेशन को इस आधार पर चुनौती दी गई है कि जाति-आधारित भेदभाव को सख्ती से एससी, एसटी और ओबीसी सदस्यों के खिलाफ भेदभाव के रूप में परिभाषित किया गया है।

बीजेपी नेता भी कर रहे विरोध

गौरतलब है कि नए रेगुलेशन का पूरे देशभर में सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक विरोध हो रहा है। सवर्ण समुदाय के लोग जगह-जगह विरोध कर रहे हैं। यहां तक कि बीजेपी का सवर्ण समाज भी विरोध में शामिल है। अब विरोध को देखते हुए सरकार भी मंथन करने पर विवश हुई है। सरकार इस पर जानकारों से सलाह ले रही है और इसमें बदलाव करने के लिए भी सोचा जा रहा हैं। खास बात है कि इन नए नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई याचिका दाखिल की जा चुकी हैं। याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि इन नियमों को मौजूदा स्थिति में लागू करने से रोका जाय। साथ ही यह भी घोषित करने का अनुरोध किया गया है कि जाति के आधार पर निवारण व्यवस्था बनाना भेदभाव है। इस फ्रेमवर्क से गैर आरक्षित वर्गों के खिलाफ दुश्मनी को बढ़ावा मिलेगा। न्यायालय से आग्रह किया है कि ’जाति-आधारित भेदभाव’ की जाति-निरपेक्ष और संवैधानिक रूप से अनुकूल परिभाषा अनिवार्य की जानी चाहिए, जो जातिगत पहचान की परवाह किए बिना उन सभी व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान करे जिनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव किया जाता है।