Supreme Court On Student Protest: 'शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार छीना नहीं जा सकता', दिल्ली और बिहार में छात्रों पर पुलिस कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
नई दिल्ली: नीट (NEET) पेपर लीक और छात्र आंदोलन पर पुलिस कार्रवाई के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन संविधान द्वारा संरक्षित है। अदालत ने पुलिस ज्यादती के आरोपों की स्वतंत्र जांच और देशभर में पुलिस के लिए एक समान प्रोटोकॉल लागू करने की बात कही।
भदैनी मिरर न्यूज नेटवर्क
नीट (NEET) पेपर लीक के विरोध में देश भर में चल रहे छात्र आंदोलनों और उन पर हुई पुलिसिया कार्रवाई को लेकर सोमवार (27 जुलाई 2026) को सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने बेहद सख्त टिप्पणी की है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत नागरिकों को शांतिपूर्ण और कानूनसम्मत विरोध प्रदर्शन करने का पूरा अधिकार है और महज आंदोलन करने के आधार पर लाठीचार्ज या अत्यधिक बल प्रयोग को सही नहीं ठहराया जा सकता।
मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने की। यह सुनवाई 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों पर हुए लाठीचार्ज और बिहार के सिवान में पुलिस कार्रवाई से जुड़ी याचिकाओं पर हुई।
"प्रदर्शन रोकने के नाम पर लाठीचार्ज मंजूर नहीं": सुप्रीम कोर्ट
कानूनी मामलों की रिपोर्टिंग करने वाली प्रमुख वेबसाइटों लाइव लॉ और बार एंड बेंच के अनुसार, सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने मौखिक रूप से कहा:
"शांतिपूर्ण और कानूनसम्मत प्रदर्शन का अधिकार संविधान के तहत पूरी तरह सुनिश्चित और सुरक्षित है। जब तक आंदोलन शांतिपूर्ण है, केवल इसलिए कि आंदोलन हो रहा है, अत्यधिक बल का प्रयोग नहीं किया जा सकता। अगर कहीं भी पुलिस ज्यादती के आरोप हैं, तो उनकी स्वतंत्र रूप से जांच की जानी चाहिए।"
अदालत ने कहा कि यह मामला केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि देश भर में पुलिस द्वारा प्रदर्शनों से निपटने के लिए एक समान (यूनिफॉर्म) पुलिस प्रोटोकॉल की सख्त आवश्यकता है। पीठ ने जोड़ा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अनुशासन बेहद अहम है।
सिवान में AK-47 के इस्तेमाल के आरोपों पर भी चिंता
सुनवाई के दौरान याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि दिल्ली में 20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान छात्रों और समर्थकों पर बर्बर लाठीचार्ज किया गया। वहीं एक अन्य याचिका में दावा किया गया कि बिहार के सिवान में प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए पुलिस द्वारा AK-47 राइफलों का इस्तेमाल किया गया। इस पर पीठ ने गंभीर रुख अपनाते हुए निष्पक्ष जांच की बात कही।
घायल पुलिसकर्मियों पर भी जताई चिंता
सुनवाई के दौरान अदालत ने प्रदर्शन में घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों के वकील को भी पक्ष रखने की अनुमति दी। इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा:
"चाहे कोई विद्यार्थी हो या पुलिसकर्मी, किसी को भी लगी चोट समान रूप से चिंता का विषय है। हम यह पूछ सकते हैं कि ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए पुलिस बल को पर्याप्त और सुरक्षित उपकरण (जैसे हेलमेट व सुरक्षा गार्ड) क्यों मुहैया नहीं कराए गए थे।"
सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि देश में आंदोलनों को नियंत्रित करने के लिए जल्द ही नए दिशानिर्देश और पुलिस प्रोटोकॉल सामने आ सकते हैं।