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महिला वकीलों के लिए अलग बार रूम और शौचालय सुनिश्चित करें राज्य सरकारें व हाईकोर्ट: सुप्रीम कोर्ट 

SC ने कहा-"बजट की कमी बहाना नहीं"

 

नई दिल्ली: देशभर के अदालत परिसरों में महिला अधिवक्ताओं को हो रही समस्याओं का संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने एक ऐतिहासिक निर्देश जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों, केंद्रशासित प्रदेशों और उच्च न्यायालयों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे अपने-अपने क्षेत्राधिकार की सभी अदालतों में महिला वकीलों के लिए अलग बार रूम, शौचालय और अन्य अनिवार्य बुनियादी सुविधाएं प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध कराएं।

तीन जजों की पीठ ने दिया आदेश, CJI ने जताई नाराजगी

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने महिला वकीलों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह सख्त आदेश पारित किया।

कोर्ट ने कहा कि जिला और तहसील स्तर की अदालतों में जहां भी महिला वकील प्रैक्टिस कर रही हैं, वहां उनकी संख्या के अनुपात में अलग और विशेष महिला बार रूम उपलब्ध कराया जाए।

पीठ ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि यदि इन सुविधाओं के लिए फंड उपलब्ध नहीं है, तो तुरंत नया बजट आवंटित किया जाए।

हाईकोर्ट की भवन एवं बुनियादी ढांचा समितियों को इस निर्देश के क्रियान्वयन की प्राथमिकता के आधार पर निगरानी करने का आदेश दिया गया है।

पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों के हलफनामों का उल्लेख करते हुए, जहां दर्जनों अदालत परिसरों में महिलाओं के लिए शौचालय तक नहीं हैं, चीफ जस्टिस ने गहरी नाराजगी जताई और कहा— "यदि महिला बार रूम ही नहीं हैं, तो यह बेहद दयनीय स्थिति है। कोर्ट इसकी कड़ी निंदा करता है।"

अटॉर्नी जनरल करेंगे केंद्रीय समन्वय, 2 दिसंबर को अगली सुनवाई 

सुप्रीम कोर्ट ने प्रक्रिया को पारदर्शी और गति प्रदान करने के लिए भारत के अटॉर्नी जनरल (AG) आर. वेंकटरमणी को केंद्रीय समन्वयक प्राधिकारी नियुक्त किया है।

 सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के एडवोकेट जनरल तथा सरकारी वकील अपनी-अपनी प्रगति रिपोर्ट (Progress Report) अटॉर्नी जनरल के कार्यालय में जमा करेंगे।

सीनियर एडवोकेट डॉ. मोनिका गुसाईं और जायना कोठारी द्वारा उठाए गए सवालों के आधार पर कोर्ट ने जमीनी हकीकत का आकलन करने के लिए वीडियो साक्ष्य और वास्तविक निरीक्षण रिपोर्ट भी तलब की है।

 मामले की अगली महत्वपूर्ण सुनवाई 2 दिसंबर को तय की गई है, जिस दिन सुप्रीम कोर्ट इस संबंध में देशव्यापी व्यापक निर्देश जारी कर सकता है।

"शौचालय तक पहुंच बुनियादी मानवाधिकार और गरिमा का हिस्सा"

सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि अदालत परिसरों में बुनियादी ढांचे की उपलब्धता संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत जीवन और सम्मानपूर्वक जीने के मौलिक अधिकार से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है।

कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि महिला वकीलों को अपने दिन का बड़ा हिस्सा अदालतों में बिताना पड़ता है, इसलिए उनकी निजता, सुरक्षा और पेशेवर माहौल के लिए ये सुविधाएं अत्यंत आवश्यक हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी भी राज्य की वित्तीय या राजस्व संबंधी कठिनाइयां महिलाओं को यह बुनियादी मानवाधिकार देने में असफलता का बहाना नहीं बन सकतीं।