राम मंदिर दान विवाद उजागर करने वाले पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, गिरफ्तारी पर लगाई रोक
गाजियाबाद पुलिस के रोड-रेज एफआईआर मामले में शीर्ष अदालत ने दी अंतरिम राहत, भविष्य की एफआईआर पर भी लागू रहेगी सुरक्षा; इलाहाबाद हाईकोर्ट जाने की छूट
नई दिल्ली/वाराणसी (भदैनी मिरर)। अयोध्या राम मंदिर दान विवाद और भ्रष्टाचार से जुड़ी खबरों को उजागर करने वाले स्वतंत्र पत्रकार अभिषेक उपाध्याय को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने मंगलवार को एक अंतरिम आदेश पारित करते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस को पत्रकार के खिलाफ किसी भी तरह की कठोर या दंडात्मक कार्रवाई करने से रोक दिया है। खास बात यह है कि अदालत ने इस सुरक्षा को भविष्य में दर्ज होने वाली किसी भी संभावित एफआईआर पर भी लागू रखने का निर्देश दिया है।
गाजियाबाद एफआईआर मामले में सुनवाई
यह मामला गाजियाबाद के इंदिरापुरम पुलिस स्टेशन में 18 अगस्त को दर्ज हुई एक एफआईआर से जुड़ा है। एक शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि शिप्रा मॉल के पास उसकी मोटरसाइकिल को पत्रकार की कार ने टक्कर मार दी और उनके बीच कहासुनी हुई। इस मामले में पुलिस ने कठोर धाराओं (जिसमें एससी/एसटी एक्ट भी शामिल है) के तहत मामला दर्ज किया था।
पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को दुर्भावनापूर्ण और फर्जी बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रद्द करने और गिरफ्तारी से सुरक्षा की मांग की थी।
अदालत में वरिष्ठ अधिवक्ता ने रखा पक्ष
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप राय ने कहा कि पत्रकार का "अपराध" केवल इतना था कि उन्होंने राम मंदिर दान से जुड़ी अनियमितताओं और अन्य घोटालों को उजागर किया। वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता को एफआईआर की पूरी प्रति तक मुहैया नहीं कराई गई थी और पुलिस उनके घर पर दबिश दे रही थी।
पीठ ने पत्रकार की सुरक्षा संबंधी आशंकाओं को समझते हुए निर्देश दिया कि गाजियाबाद पुलिस तुरंत एफआईआर की प्रति याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एफआईआर की कॉपी मिलते ही याचिकाकर्ता उचित राहत (एफआईआर रद्द कराने) के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
CCTV फुटेज सुरक्षित रखने की मांग
पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने अपनी याचिका में रोड-रेज के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि घटना वाले दिन वह अपनी बेटी के साथ थे और वहां कोई शारीरिक टकराव या दुर्घटना नहीं हुई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस आसपास के दुकानदारों पर सीसीटीवी फुटेज हटाने का दबाव बना रही है। याचिका में निष्पक्ष जांच के लिए सीसीटीवी फुटेज को संरक्षित करने और आवश्यकता पड़ने पर मामले की जांच सीबीआई जैसी स्वतंत्र एजेंसी से कराने की मांग की गई है।
मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को तय की गई है, तब तक गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर को एफआईआर की प्रति सौंपने से संबंधित अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।