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बढ़ती महंगाई और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के रुख से आरबीआई पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव, एफपीआई ने शेयर बाजार से पैसे निकालकर हेल्थकेयर सेक्टर का रुख किया

खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82% होने और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के बीच विदेशी निवेशकों ने वित्तीय सेवा (फाइनेंशियल सर्विसेज) शेयरों से बिकवाली की और भारत के मजबूत हेल्थकेयर सेक्टर में भारी निवेश किया है।

 

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पर अक्टूबर की शुरुआत में ही ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव बन सकता है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त (हॉकिश) रुख, भारत और अमेरिका के बीच ब्याज दरों के घटते अंतर, कच्चे तेल (क्रूड) की मजबूत कीमतों और घरेलू महंगाई में तेजी के कारण वृहद आर्थिक (मैक्रोइकोनॉमिक) परिस्थितियां तेजी से बदली हैं।

महंगाई का दबाव और अतिरिक्त नकदी

अगस्त में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82% (जुलाई में 4.45%) पर पहुंच गई। इसकी मुख्य वजह खाद्य महंगाई में तेजी (जो सीपीआई सूचकांक का लगभग 35% हिस्सा है) और कोर तथा कोर-कोर महंगाई का बढ़ना है। चीनी, अनाज और हाउसिंग-ईंधन जैसे सेगमेंट में महीने-दर-महबने लगातार बढ़त देखने को मिल रही है।

दूसरी ओर, FCNR(B) योजना के जरिए 127 अरब अमेरिकी डॉलर आने से विदेशी मुद्रा भंडार तो मजबूत हुआ है, लेकिन बैंकिंग सिस्टम में जरूरत से ज्यादा नकदी (लिक्विडिटी) आ गई है। आयातित महंगाई के जोखिम और अतिरिक्त नकदी के इस मेल से केंद्रीय बैंक को नीतिगत सख्ती बरतने का आधार मिल गया है।

फाइनेंशियल, ऑटो और एनर्जी सेक्टर से एफपीआई की निकासी

इन मैक्रो चुनौतियों के बीच, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने बिकवाली जारी रखी और 18 सितंबर तक भारतीय इक्विटी से 20,974 करोड़ रुपये निकाल लिए।

  • वित्तीय सेवाओं (Financial Services) पर इसका सबसे बुरा असर पड़ा, जहां 1 से 15 सितंबर के बीच एफपीआई ने 6,204 करोड़ रुपये की निकासी की।

  • ऑटोमोबाइल सेक्टर से 2,670 करोड़ रुपये निकाले गए।

  • ऑयल एंड गैस (2,385 करोड़ रुपये), एफएमसीजी (2,029 करोड़ रुपये), पावर (1,653 करोड़ रुपये), टेलिकॉम (991 करोड़ रुपये) और आईटी (960 करोड़ रुपये) शेयरों में भी लगातार बिकवाली देखी गई।

सुरक्षित निवेश के रूप में हेल्थकेयर उभरा

बाज़ार के इस नकारात्मक रुख के उलट, हेल्थकेयर सेक्टर संस्थागत पूंजी का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है। 1 से 15 सितंबर के बीच एफपीआई ने हेल्थकेयर सेक्टर में 2,114 करोड़ रुपये का निवेश किया, जिससे उनकी लगातार खरीदारी का सिलसिला छह पखवाड़े (fortnights) तक पहुंच गया है। जून के बाद से इस सेक्टर में कुल 17,235 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश आ चुका है, जिससे एसेट्स अंडर कस्टडी (AUC) बढ़कर 5,35,596 करोड़ रुपये हो गई है।

इस मजबूत मांग के चलते निफ्टी हेल्थकेयर इंडेक्स पिछले छह महीनों में लगभग 17.69% चढ़ चुका है, जिसने इसी अवधि में मात्र 1% का रिटर्न देने वाले निफ्टी 50 को पीछे छोड़ दिया है। घरेलू म्यूचुअल फंडों ने भी इस पर भरोसा दिखाया है और अगस्त में हेल्थकेयर एलोकेशन को बढ़ाकर 8.4% कर दिया, जो 71 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है।

हेल्थकेयर के लिए मजबूत संरचनात्मक (स्ट्रक्चरल) कारक

बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच निवेशक उन डिफेंसिव सेक्टरों को प्राथमिकता दे रहे हैं जहां कमाई की बेहतर संभावना नजर आती है। इसके मुख्य कारणों में शामिल हैं:

  • अस्पताल संचालक (Hospital Operators): मरीजों की मजबूत मांग, बेड ऑक्यूपेंसी और प्रति बेड औसत आय में वृद्धि का फायदा मिल रहा है। रेटिंग एजेंसी ICRA की जुलाई रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2027 में अस्पताल कंपनियों की आय में 13-15% और वित्त वर्ष 2028 में 15-17% की वृद्धि का अनुमान है।

  • डायग्नोस्टिक्स: जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों में वृद्धि, स्वास्थ्य जागरूकता और बढ़ते बीमा कवरेज के कारण संगठित (ऑर्गेनाइज्ड) डायग्नोस्टिक खिलाड़ियों को बढ़ावा मिल रहा है। ICRA को इस सेक्टर में वित्त वर्ष 2027 के दौरान 12-14% की वृद्धि की उम्मीद है।