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MP High Court Decision: NDPS मामले में जब्त वाहन पर फाइनेंसर का हक नहीं, लोन डिफॉल्ट पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

लोन की किस्तें न चुकाने के आधार पर NDPS Act में जब्त वाहन फाइनेंसर को नहीं सौंपा जा सकता, एमपी हाईकोर्ट ने एसके फाइनेंस की याचिका खारिज की।

 

जबलपुर / डिजिटल डेस्क (भदैनी मिरर): मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए स्पष्ट किया है कि एनडीपीएस ऐक्ट (NDPS Act) के तहत किसी अपराध में जब्त किए गए वाहन की अंतरिम सुपुर्दगी (Interim Custody) केवल इस आधार पर फाइनेंसर या फाइनेंस कंपनी को नहीं दी जा सकती कि वाहन मालिक ने लोन की किस्तें (EMI) चुकाना बंद कर दिया है।

कोर्ट ने साफ कहा कि लोन एग्रीमेंट के जरिए मिलने वाला वाहन री-पजेशन का अधिकार महज एक संविदात्मक/दीवानी अधिकार (Contractual Right) है, जिसका इस्तेमाल लंबित आपराधिक मामले में वाहन पर कब्जा पाने के लिए नहीं किया जा सकता।

जस्टिस जय कुमार पिल्लई की एकल पीठ ने 'एसके फाइनेंस लिमिटेड' की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए यह बड़ा फैसला सुनाया। फाइनेंस कंपनी ने विशेष एनडीपीएस कोर्ट नीमच के 2 अप्रैल 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें जब्त वाहन की सुपुर्दगी देने की अर्जी खारिज कर दी गई थी।

क्या था पूरा मामला?

मामला नीमच सिटी थाना क्षेत्र का है। पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि एक व्यक्ति अपने वाहन से राजस्थान अफीम की तस्करी करने जा रहा है। पुलिस ने नाकाबंदी कर वाहन की तलाशी ली, जहां से 7 किलोग्राम अफीम बरामद हुई। पुलिस ने वाहन के मालिक को गिरफ्तार कर वाहन को जब्त कर लिया था।

जांच में सामने आया कि आरोपी ने एसके फाइनेंस लिमिटेड से ₹5,04,741 का लोन लेकर वाहन खरीदा था। कंपनी का दावा था कि आरोपी पर ₹4,70,274 का लोन बकाया है और उसने किस्तें देना बंद कर दिया है। इसी आधार पर कंपनी ने वाहन की कस्टडी मांगी थी।

हाईकोर्ट के मुख्य कानूनी बिंदु और फैसले के आधार:

  1. आपराधिक अदालत दीवानी अनुबंध लागू कराने का मंच नहीं:

    हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय बिश्वजीत डे बनाम असम राज्य का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने वाली आपराधिक अदालतें किसी दीवानी अनुबंध या लोन समझौते की शर्तों को लागू करने का फोरम नहीं हैं। लोन डिफॉल्ट का मामला पूरी तरह दीवानी विवाद (Civil Dispute) का विषय है।

  2. हाइपोथिकेशन से मालिकाना हक नहीं बदलता:

    रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (RC) में फाइनेंस कंपनी का नाम हाइपोथिकेशन के रूप में दर्ज होने की दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि इससे केवल कंपनी का वित्तीय हित सुरक्षित होता है। इससे आपराधिक कार्यवाही के लिए वाहन का वैधानिक स्वामित्व (Legal Ownership) फाइनेंसर को हस्तांतरित नहीं हो जाता।

  3. केवल मालिक या एजेंट को ही सुपुर्दगी का अधिकार:

    पीठ ने स्पष्ट किया कि फाइनेंस कंपनी न तो वाहन की रजिस्टर्ड मालिक है और न ही मालिक की अधिकृत एजेंट। वह केवल एक फाइनेंसर है, इसलिए उसे आपराधिक प्रक्रिया के तहत जब्त वाहन की अंतरिम सुपुर्दगी पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

आगे का विकल्प क्या है?

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि वाहन मालिक ने लोन की शर्तों का उल्लंघन किया है, तो फाइनेंस कंपनी के पास दीवानी मुकदमा (Civil Suit) ठोकने या मध्यस्थता (Arbitration) की कार्यवाही शुरू करने का रास्ता खुला है। हालांकि, इससे विशेष एनडीपीएस जज को लंबित आपराधिक मामले के दौरान वाहन फाइनेंसर को सौंपने का अधिकार नहीं मिल जाता।

हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के फैसले को न्यायसंगत ठहराते हुए फाइनेंस कंपनी की पुनरीक्षण याचिका को पूरी तरह से निरस्त कर दिया।