कुनबी प्रमाणपत्र रद्द होने पर भड़के मनोज जरांगे, सरकार पर लगाया साजिश का आरोप
मराठवाड़ा की 4 महिला जनप्रतिनिधियों के कुनबी सर्टिफिकेट रद्द होने पर जरांगे पाटिल ने 2029 में 'बदला' लेने की दी चेतावनी; मुख्यमंत्री फडणवीस ने राजनीतिक हस्तक्षेप के दावों को किया खारिज।
मुंबई/जालना (भदैनी मिरर डेस्क): महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है। मराठा आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जरांगे पाटिल ने गुरुवार को राज्य सरकार पर मराठा समाज को निशाना बनाने और उनके खिलाफ साजिश रचने का गंभीर आरोप लगाया है। यह तीखी प्रतिक्रिया जाति जांच समिति द्वारा मराठवाड़ा क्षेत्र की चार महिला मराठा जनप्रतिनिधियों के 'कुनबी जाति प्रमाण पत्र' रद्द किए जाने के बाद आई है।
2029 में लेंगे सबसे बड़ा बदला: मनोज जरांगे
पत्रकारों को संबोधित करते हुए मनोज जरांगे पाटिल ने सरकार और उसके मंत्रियों पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले जानबूझकर प्रमाणपत्र जारी किए जाते हैं और बाद में उन्हें रद्द कर दिया जाता है।
जरांगे पाटिल ने कहा, "जिस सरकार को मराठों ने चुनकर सत्ता में पहुंचाया, वही आज समाज के साथ विश्वासघात कर रही है। यह महाराष्ट्र सरकार के भीतर से रची गई एक बड़ी और सोची-समझी साजिश है। हम 2029 के चुनावों में इसका सबसे बड़ा बदला लेंगे।"
मीडिया को कुछ दस्तावेज दिखाते हुए जरांगे ने दावा किया कि ज्योति शिंदे का प्रमाणपत्र राजनीतिक द्वेष के तहत रद्द किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि एक वरिष्ठ मंत्री ने चुनाव हारने के बाद अधिकारियों पर दबाव बनाकर प्रमाणपत्र निरस्त करने के आदेश दिए थे। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सभी ऐतिहासिक रिकॉर्ड और साक्ष्य मौजूद हैं, तो वैध प्रमाणपत्रों को फर्जी क्यों बताया जा रहा है।
मुख्यमंत्री फडणवीस की सफाई: समिति पूरी तरह स्वायत्त
मनोज जरांगे पाटिल के आरोपों पर पलटवार करते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने किसी भी तरह के राजनीतिक या प्रशासनिक हस्तक्षेप से साफ इनकार किया है।
मुख्यमंत्री फडणवीस ने स्पष्ट किया, "जाति जांच समिति सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के दिशानिर्देशों के तहत कार्य करने वाली एक स्वायत्त संस्था है। राज्य सरकार इसके कामकाज में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करती है।"
उन्होंने आगे बताया कि समिति के पास जाने वाले कुल आवेदनों में से औसतन 10 से 12 प्रतिशत प्रमाणपत्र नियमों के तहत नियमित रूप से अस्वीकार होते हैं, जो कभी-कभी गैर-कुनबी ओबीसी श्रेणियों में 10 से 25 प्रतिशत तक पहुंच जाते हैं। इसलिए किसी विशेष समुदाय के प्रमाणपत्र जानबूझकर रद्द किए जाने का आरोप पूरी तरह निराधार है।