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'उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो'... मशहूर शायर बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन, साहित्य जगत में शोक

लंबे समय से डिमेंशिया से पीड़ित थे पद्मश्री बशीर बद्र, भोपाल में ली आखिरी सांस; जावेद अख्तर बोले- 'आज उर्दू और गरीब हो गई'

 

भोपाल / नई दिल्ली: उर्दू शायरी और अदब की दुनिया का एक चमकता सितारा हमेशा के लिए गर्दिश में खो गया। अपने अल्फाजों से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले अजीम शायर बशीर बद्र का गुरुवार को 91 वर्ष की उम्र में भोपाल में निधन हो गया। वह पिछले लंबे समय से भूलने की बीमारी (डिमेंशिया) से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर आते ही साहित्य, संस्कृति और मुशायरों की दुनिया में शोक की लहर दौड़ गई है।

जावेद अख्तर ने जताया दुख: "उर्दू आज और गरीब हो गई"

बशीर बद्र के रुखसत होने पर देश-दुनिया के साहित्यकारों ने गहरा दुख व्यक्त किया है। जाने-माने गीतकार और शायर जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया पर भावुक पोस्ट साझा करते हुए लिखा, "उर्दू आज और गरीब हो गई। नायाब शायर बशीर बद्र ने हमेशा के लिए रुखसत ले ली। उनकी शायरी हमारी यादों में हमेशा ताजा रहेगी।"

आम बोलचाल की भाषा के जादूगर थे बशीर बद्र

15 फरवरी 1935 को जन्मे बशीर बद्र (पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर) ने उर्दू शायरी को महलों और संभ्रांत गलियारों से निकालकर आम आदमी के दिलों तक पहुंचाया। उन्होंने पारंपरिक और जटिल उर्दू शब्दों की जगह सहज, सरल और रोजमर्रा की बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल किया। यही वजह थी कि उनका हर शेर सीधे सुनने वाले के दिल में उतर जाता था। उन्होंने कई दशकों तक देश-विदेश के मुशायरों में अपनी आवाज और अंदाज का जादू बिखेरा।

1999 में मिला था 'पद्मश्री' सम्मान

उर्दू साहित्य और गजल लेखन में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1999 में उन्हें 'पद्मश्री' से नवाजा था। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से विभूषित किया गया था। उनकी गजलों में मोहब्बत, तन्हाई, उदासी और इंसानी रिश्तों के एहसासों की गहरी और मुकम्मल छाप देखने को मिलती है।

सदाबहार हैं बशीर बद्र के ये मशहूर शेर

बशीर बद्र साहब के लिखे कई शेर आज भी लोगों की जुबान पर हैं और अक्सर सोशल मीडिया व मंचों पर दोहराए जाते हैं:

"अगर तलाश करूं कोई मिल ही जाएगा,

मगर तुम्हारी तरह कौन मुझ को चाहेगा?"

"उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,

न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।"

"कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,

ये नए मिजाज का शहर है जरा फासले से मिला करो।"

बशीर बद्र साहब भले ही इस दुनिया को अलविदा कह गए हों, लेकिन अपनी गज़लों, नज़्मों और शेरों के 'उजाले' वह हमेशा के लिए प्रशंसकों के दिलों में छोड़ गए हैं। भदैनी मिरर परिवार की ओर से उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि।