खाड़ी में बढ़ा युद्ध का खतरा, तेल आपूर्ति पर संकट; भारत ने रूस से आयात बढ़ाने की बनाई रणनीति
होर्मुज जलडमरूमध्य में हमलों से वैश्विक सप्लाई पर असर, कच्चा तेल रिकॉर्ड स्तर पर; सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा पर की उच्चस्तरीय समीक्षा
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और खाड़ी देशों में बमबारी की खबरों के बीच वैश्विक कच्चे तेल बाजार में उथल-पुथल मच गई है। वायदा कारोबार में कच्चे तेल की कीमतें उछलकर 6,596 रुपये प्रति बैरल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं।
सबसे बड़ी चिंता होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर है, जो फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित एक अहम समुद्री मार्ग है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस निर्यात इसी रास्ते से होता है। हालिया हमलों के बाद यहां से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा को लेकर आशंकाएं बढ़ गई हैं।
भारत के लिए क्यों अहम है होर्मुज?
भारत अपने कुल कच्चे तेल का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। इसमें से करीब 50 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में एलपीजी खाड़ी देशों—इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत—से आता है, जो इसी मार्ग से होकर गुजरता है।
यदि क्षेत्र में तनाव लंबा खिंचता है, तो तेल के साथ गैस आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है। इससे न केवल आयात बिल बढ़ेगा, बल्कि घरेलू ईंधन कीमतों पर भी दबाव बढ़ेगा।
रूस से बढ़ सकती है आपूर्ति
स्थिति की समीक्षा के लिए केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक की। सूत्रों के अनुसार, सरकार वैकल्पिक और सुरक्षित मार्गों से आपूर्ति सुनिश्चित करने की रणनीति पर काम कर रही है।
ऐसे में रूस से कच्चे तेल का आयात बढ़ाने की संभावना पर विचार किया जा रहा है। वर्ष 2022 के बाद भारत ने रूस से तेल आयात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की थी, हालांकि हाल के महीनों में इसका हिस्सा घटा है।
भारत के पास फिलहाल लगभग 74 दिनों का रणनीतिक कच्चा तेल भंडार मौजूद है, जिससे शुरुआती झटके को संभाला जा सकता है। हालांकि, यदि संकट लंबा चलता है तो इन भंडारों पर दबाव बढ़ सकता है।
गैस सप्लाई भी बड़ी चिंता
फरवरी 2026 में भारत ने करीब 2.03 मिलियन टन एलपीजी आयात की, जिसमें से 1.66 मिलियन टन खाड़ी देशों से आई। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हमले जारी रहे और प्रमुख कंपनियों—जैसे Saudi Aramco—की रिफाइनरी गतिविधियां प्रभावित हुईं, तो वैश्विक बाजार में अस्थिरता और बढ़ सकती है।
ईरान प्रतिदिन लगभग 16 लाख बैरल तेल निर्यात करता है, जिसका बड़ा हिस्सा चीन को जाता है। यदि यह निर्यात बाधित होता है, तो चीन को वैकल्पिक स्रोतों की ओर रुख करना पड़ेगा, जिससे वैश्विक कीमतों पर और दबाव पड़ेगा।
ओपेक प्लस का फैसला
आठ देशों के समूह OPEC+ ने अप्रैल में उत्पादन 2.06 लाख बैरल प्रतिदिन बढ़ाने का फैसला किया है। हालांकि, यदि पश्चिम एशिया में हालात सामान्य नहीं होते हैं, तो इसका सकारात्मक असर सीमित रह सकता है।
40 देशों से खरीदता है भारत तेल
ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए भारत अब लगभग 40 देशों से कच्चा तेल खरीद रहा है, जबकि 2022 से पहले यह संख्या 27 थी। सरकार बहु-स्रोत रणनीति अपनाकर जोखिम कम करने की दिशा में काम कर रही है।
फिलहाल सरकार स्थिति पर करीबी नजर रखे हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही प्रभावित होती है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ी उथल-पुथल देखने को मिल सकती है।