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'कॉकरोच जनता पार्टी' और फर्जी वकीलों के खिलाफ CBI जांच की मांग, सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर

कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों के कमर्शियल इस्तेमाल और मीम्स बनाने पर रोक लगाने की गुहार; राजा चौधरी ने दाखिल की याचिका

 

नई दिल्ली (भदैनी मिरर डेस्क): सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही के दौरान हुई एक मौखिक टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर शुरू हुए 'कॉकरोच जनता पार्टी' (Cockroach Janta Party) कैंपेन और देश में फर्जी वकीलों के मामले ने अब कानूनी रूप ले लिया है। सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर इस पूरे घटनाक्रम और फर्जी वकीलों के रैकेट के खिलाफ केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की मांग की गई है।

यह याचिका राजा चौधरी नामक व्यक्ति द्वारा दायर की गई है, जिसमें अदालती कार्यवाही के वीडियो क्लिप्स का कमर्शियल इस्तेमाल करने और ट्रेडमार्क बनाने का विरोध किया गया है।

क्या है पूरा मामला और क्यों शुरू हुआ विवाद?

दरअसल, यह पूरा मामला मई 2026 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट की पदवी से जुड़ी एक सुनवाई के दौरान शुरू हुआ था। सुनवाई के दौरान पीठ ने कानूनी पेशे में गिरते स्तर और फर्जी वकीलों पर चिंता जताई थी। इसी दौरान की गई एक मौखिक टिप्पणी को सोशल मीडिया पर संदर्भ से अलग (Out of Context) काटकर वायरल कर दिया गया। इसके बाद सोशल मीडिया पर एक प्रतीकात्मक और व्यंग्यात्मक अभियान शुरू हुआ, जिसे 'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम दिया गया। देखते ही देखते इस पेज के लाखों फॉलोअर्स हो गए।

याचिका में उठाए गए मुख्य मुद्दे:

  • अदालती कार्यवाही का व्यवसायीकरण: याचिकाकर्ता का आरोप है कि कोर्ट रूम में होने वाली बहस और मौखिक टिप्पणियों को चुनिंदा तरीके से काटकर रील्स, मीम्स और मर्चेंडाइज (टी-शर्ट, मग आदि) बनाकर बेचा जा रहा है। यहां तक कि 'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम से ट्रेडमार्क (Trademark) के लिए भी आवेदन कर दिया गया है।

  • फर्जी वकीलों का बढ़ता जाल: याचिका में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के चेयरमैन के उस हालिया बयान का भी हवाला दिया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि देश में करीब 35 से 40 फीसदी वकील फर्जी हैं। याचिका में फर्जी डिग्री धारकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की गई है।

अभिव्यक्ति की आजादी बनाम कमर्शियल इस्तेमाल

याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया है कि यह याचिका न्यायपालिका की वैध आलोचना, लोकतांत्रिक असहमति, व्यंग्य या संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्राप्त बोलने की स्वतंत्रता को दबाने के लिए नहीं है।

याचिका में कहा गया: "अदालती कार्यवाही के दौरान न्यायाधीशों द्वारा की जाने वाली मौखिक टिप्पणियां कोई अंतिम फैसला नहीं होती हैं। इनका उपयोग राजनीतिक ब्रांडिंग, मीम्स बनाने, ट्रेडमार्क का लाभ लेने या पैसे कमाने (Monetization) के लिए नहीं किया जा सकता। यह संवैधानिक कार्यवाही का खतरनाक वस्तुकरण (Commodification) है, जिससे न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचती है।"

इन विभागों को बनाया गया पक्षकार

इस याचिका में भारत सरकार (Union of India), इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को प्रतिवादी (Respondents) बनाया गया है।

याचिका में शीर्ष अदालत से मांग की गई है कि वह सीबीआई या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी को देश में फर्जी वकीलों और फर्जी लॉ डिग्री की जांच करने का निर्देश दे। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणियों का गलत इस्तेमाल कर वित्तीय लाभ कमाने वाले तत्वों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की गाइडलाइन तय करे।