एप्पल का अब तक का सबसे बड़ा झटका: भारत में MacBook और iPad अचानक हुए 1 लाख रुपये तक महंगे
AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के चक्कर में जेब पर बढ़ा बोझ; महंगे कंपोनेंट्स, रैम और एडवांस्ड चिप्स के चलते Apple ने बढ़ाए दाम
भदैनी मिरर: भारत में एप्पल (Apple) के प्रोडक्ट्स हमेशा से ही प्रीमियम और स्टेटस सिंबल माने जाते रहे हैं। छात्र से लेकर वर्किंग प्रोफेशनल्स तक, लोग महीनों की सेविंग्स के बाद मैकबुक (MacBook) या आईपैड (iPad) खरीदने का सपना देखते हैं। लेकिन अगर आप भी इस साल एप्पल का कोई नया प्रोडक्ट खरीदने की सोच रहे थे, तो आपके लिए एक बड़ा झटका है। पिछले कुछ हफ्तों में एप्पल ने भारत में अपने कई प्रीमियम प्रोडक्ट्स की कीमतों में भारी बढ़ोतरी कर दी है।
बाजार में आए इस अचानक उछाल से कई हाई-एंड कॉन्फिगरेशन वाले डिवाइस पहले के मुकाबले करीब 70,000 रुपये से लेकर 1 लाख रुपये तक महंगे हो गए हैं।
किन प्रोडक्ट्स की कीमतों में हुआ सबसे ज्यादा इजाफा?
एप्पल ने यह प्राइस हाइक मुख्य रूप से अपने प्रोफेशनल और प्रीमियम सेगमेंट के प्रोडक्ट्स पर की है। इसमें MacBook Pro, iPad, Mac Studio, Mac mini, HomePod और Apple TV शामिल हैं। हालांकि, राहत की बात यह है कि कंपनी ने अपने एंट्री-लेवल (शुरुआती) मॉडल्स की कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है। सबसे बड़ा झटका उन प्रोफेशनल्स को लगा है जो फुली लोडेड या टॉप-एंड मैकबुक प्रो मॉडल्स खरीदना चाहते थे, जिनकी कीमतें अब सीधे 1 लाख रुपये तक बढ़ चुकी हैं।
आखिर क्यों अचानक इतनी बढ़ गई कीमतें?
टेक एक्सपर्ट्स के अनुसार, इस भारी मूल्य वृद्धि का सीधा कनेक्शन उस दौड़ से है जो इस समय पूरी टेक इंडस्ट्री में चल रही है— यानी AI (Artificial Intelligence)-फर्स्ट डिवाइसेज बनाने की होड़।
विभवंगल अनुकूलकरा प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर सिद्धार्थ मौर्या ने इस पर रोशनी डालते हुए बताया, "आजकल के एआई-पावर्ड गैजेट्स को सुचारू रूप से चलाने के लिए बहुत ज्यादा रैम (RAM), फास्ट स्टोरेज और एडवांस्ड प्रोसेसर की जरूरत होती है। ये कंपोनेंट्स इतने सक्षम होते हैं कि जटिल एआई एल्गोरिदम को बिना क्लाउड के सीधे डिवाइस पर ही रन कर सकें।"
चूंकि स्मार्टफोन मेकर्स के साथ-साथ बड़े डेटा सेंटर्स और एआई कंपनियां भी इन्हीं प्रीमियम कंपोनेंट्स को खरीद रही हैं, इसलिए बाजार में इनकी डिमांड बहुत बढ़ गई है और कंपोनेंट कॉस्ट (लागत) आसमान छूने लगी है। इसके अलावा कंपनियां एआई रिसर्च और कस्टम सिलिकॉन चिप्स को विकसित करने में अरबों रुपये खर्च कर रही हैं, जिसकी वसूली अंततः कंज्यूमर्स से ही की जा रही है।
सिर्फ हार्डवेयर नहीं, इकोसिस्टम और इनोवेशन के पैसे ले रहा एप्पल
थिंकआर्कलव (Thinkarklub) के राजवीर सिंह का मानना है कि एप्पल की यह रणनीति सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा, "ग्राहक सिर्फ एक हार्डवेयर नहीं खरीद रहे हैं, बल्कि वे एप्पल के एक पूरे एआई इकोसिस्टम और फ्यूचर-प्रूफ टेक्नोलॉजी में निवेश कर रहे हैं। एप्पल की ब्रांड वैल्यू इतनी मजबूत है कि उसके पास 'प्राइसिंग पावर' है। जब मांग अटूट हो, तो कंपनी अपने प्रीमियम को सही ठहरा सकती है।"
मेमोरी का ग्लोबल संकट बदल रहा है बाजार का गणित
ग्लोबल मार्केट में इस समय हाई-बैंडविड्थ मेमोरी और एडवांस्ड स्टोरेज चिप्स की भारी कमी (Memory Crunch) है। ऑन-डिवाइस एआई फीचर्स (जैसे इमेज जनरेशन और एडवांस्ड एआई असिस्टेंस) को प्रोसेस करने के लिए अब डिवाइसेज में ज्यादा रैम देना जरूरी हो गया है। इस वजह से प्रीमियम इलेक्ट्रॉनिक्स सामान स्ट्रक्चरल रूप से महंगे होते जा रहे हैं।
भारतीय खरीदारों के लिए क्या है इसका मतलब?
विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल एप्पल का फैसला नहीं है, बल्कि पूरी टेक इंडस्ट्री अब इसी दिशा में आगे बढ़ रही है। आने वाले समय में एआई क्षमताएं ही इलेक्ट्रॉनिक्स की कीमतों को तय करेंगी। भारतीय खरीदारों के लिए संदेश साफ है कि यदि वे आने वाले दिनों में कीमतों के घटने का इंतजार कर रहे हैं, तो शायद ऐसा न हो, क्योंकि एआई अब तकनीक की दुनिया में एक परमानेंट कॉस्ट ड्राइवर (लागत बढ़ाने वाला कारक) बन चुका है।