Ranabaali Movie Review: विजय देवरकोंडा-रश्मिका की केमेस्ट्री ने जीता दिल
1876-78 के मद्रास अकाल की पृष्ठभूमि पर बनी 'रणबाली', विजय और रश्मिका की ऑन-स्क्रीन जोड़ी ने जमाया रंग
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली (भदैनी मिरर): इतिहास की किताबों में ब्रिटिश हुकूमत के जुल्मों को पढ़कर अक्सर हर भारतीय के मन में ख्याल आता है—"किसी ने उसी वक्त मुंहतोड़ जवाब क्यों नहीं दिया?" निर्देशक राहुल संकृत्यान की फिल्म 'रणबाली' (Ranabaali) इसी बाल-सुलभ विचार को एक 3 घंटे के सिनेमाई ड्रामा में बदलने की कोशिश करती है। 1876-78 के भयानक 'मद्रास अकाल' (Madras Famine) की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म इतिहास को न्याय देने की कोशिश तो करती है, लेकिन दर्शक के धैर्य का कड़ा इम्तिहान भी लेती है।
क्या है फिल्म की कहानी?
कहानी 1850 के दशक के रायलसीमा क्षेत्र से शुरू होती है। सिंगनामला बोब्बीली रणबाली (विजय देवरकोंडा) का जन्म एक रहस्यमयी गुफा के बाहर होता है। वह बड़ा होकर एक बहादुर घुड़सवार और योद्धा बनता है, जो अपनी मिट्टी, परंपराओं और समाज से गहराई से जुड़ा है।
कहानी में मोड़ तब आता है जब मद्रास में भयानक अकाल पड़ता है। औपनिवेशिक ब्रिटिश प्रशासन अकाल के बावजूद भारत से अनाज बाहर भेजता रहता है। इस अकाल और ब्रिटिश क्रूरता (जिसका चेहरा कमिश्नर सर थियोडोर हेक्टर यानी अर्नोल्ड वोस्लू हैं) के खिलाफ रणबाली हथियार उठाता है। वह किसी राष्ट्रीय स्वतंत्रता सेनानी के रूप में नहीं, बल्कि अपने गांव, अपनी पत्नी और अपने लोगों की जान बचाने के लिए लड़ता है।
अभिनय और किरदार: विजय-रश्मिका की केमेस्ट्री चमकी
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विजय देवरकोंडा (रणबाली): विजय ने रायलसीमा बोली और शारीरिक बनावट पर काफी मेहनत की है। उन्होंने अपने संवाद खुद डब किए हैं। फर्स्ट हाफ में, जहां वे एक प्रेमी, पति और ग्रामीण के रूप में दिखते हैं, उनका अभिनय बहुत सहज और आकर्षक है। हालांकि, सेकंड हाफ में योद्धा बनते ही उनका किरदार केवल गुस्सा और धर्मसंकट तक सीमित होकर रह जाता है।
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रश्मिका मंदाना (जयम्मा): रश्मिका इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। 'जयम्मा' के किरदार में वे बेहद सहज, गर्जनापूर्ण और प्रभावशाली लगी हैं। गर्भवती होकर भी संघर्ष करने वाली महिला का किरदार उन्होंने बिना किसी अति-नाटकीयता के निभाया है।
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विजय-रश्मिका की ऑन-स्क्रीन जोड़ी: रियल लाइफ शादी के बाद पहली बार स्क्रीन पर साथ आई यह जोड़ी फिल्म का सबसे मजबूत पहलू है। दोनों के बीच की घनिष्ठता और बॉन्डिंग पर्दे पर साफ झलकती है और उनके रोमांटिक व घरेलू दृश्य फिल्म के सबसे बेहतरीन हिस्से हैं।
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अर्नोल्ड वोस्लू (विलेन): ब्रिटिश कमिश्नर के रूप में अर्नोल्ड वोस्लू का प्रदर्शन औसत है। उनके किरदार में वो ठंडी और खौफनाक क्रूरता नजर नहीं आती जो एक औपनिवेशिक खलनायक में होनी चाहिए थी।
कहां चूक गई 'रणबाली'? (कमजोर कड़ियां)
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भावनाओं पर भारी पड़ी हिंसा: फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह मानवीय संवेदनाओं को महसूस कराने के बजाय बार-बार हिंसक दृश्यों (Violence) की ओर मुड़ जाती है। सेकंड हाफ में ग्रामीणों और बच्चों पर दिखाए गए अत्याचार इतने भयानक और लंबे हैं कि दर्शक भावुक होने के बजाय 'सुन्न' हो जाते हैं।
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धीमी और दोहराव भरी पटकथा: अकाल और विरोध की शुरुआत के बाद कहानी में नयापन खत्म हो जाता है। एक ही संदेश को बार-बार दोहराया गया है, जिससे फिल्म की लंबाई (3 घंटे) बोझिल महसूस होने लगती है।
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निराशाजनक बैकग्राउंड स्कोर: अजय-अतुल का म्यूजिक इस बार प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहा। अकाल के दर्द को गहराई देने या एक्शन सीन्स में रोंगटे खड़े करने में बैकग्राउंड म्यूजिक कमजोर साबित होता है।
तकनीकी पक्ष और निर्देशन
फिल्म का प्रोडक्शन डिजाइन और 1870 के दशक का रायलसीमा क्षेत्र का सेट निर्माण काबिले तारीफ है। नीरव शाह और जिष्णु भट्टाचार्जी की सिनेमैटोग्राफी फिल्म को प्रामाणिक लुक देती है। निर्देशक राहुल संकृत्यान का इरादा और शोध नेक है, वे इतिहास के एक दबे हुए पन्ने को सामने लाना चाहते थे, लेकिन एक सिनेमाई अनुशासन के अभाव में फिल्म अपनी छाप छोड़ने में पिछड़ जाती है।
अंतिम फैसला (Verdict)
'रणबाली' एक अच्छी नीयत से बनाई गई महत्वाकांक्षी फिल्म है। यदि आप विजय देवरकोंडा और रश्मिका मंदाना की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री और ऐतिहासिक पीरियड ड्रामा देखने के शौकीन हैं, तो इसे एक बार देख सकते हैं। हालांकि, अत्यधिक हिंसा और सुस्त रफ्तार के लिए तैयार रहें।