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NASA के जेम्स वेब टेलीस्कोप ने खोजा 'छिपा हुआ' अनोखा ग्रह, ब्रह्मांड में वैज्ञानिकों को मिली बड़ी कामयाबी

धूल के गुबार के पीछे छिपा था 'Beta Pictoris d' ग्रह, वैज्ञानिकों ने कैमरे की फोटो नहीं बल्कि 'वायुमंडलीय फिंगरप्रिंट' से लगाया पता।

 

वाशिंगटन। अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में नासा (NASA) के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (James Webb Space Telescope) ने एक और ऐतिहासिक कामयाबी हासिल की है। वैज्ञानिकों ने हमारे सौरमंडल से बाहर, ब्रह्मांड के सबसे चर्चित और सबसे ज्यादा अध्ययन किए जाने वाले स्टार सिस्टम 'बीटा पिक्टोरिस' (Beta Pictoris) में एक और विशालकाय ग्रह खोज निकाला है। इस नए ग्रह को Beta Pictoris d नाम दिया गया है।

यह खोज इसलिए बेहद खास है क्योंकि इस ग्रह को किसी पारंपरिक कैमरे की तस्वीर के जरिए नहीं, बल्कि उसके वायुमंडल के रासायनिक फिंगरप्रिंट (Chemical Fingerprint) की मदद से खोजा गया है।

क्या है 'Beta Pictoris' सिस्टम और क्यों है यह खास?

पृथ्वी से करीब 63 प्रकाश वर्ष (Light-years) दूर स्थित बीटा पिक्टोरिस स्टार सिस्टम केवल 2.3 करोड़ वर्ष पुराना है। वैज्ञानिक इसे इस बात की 'प्रयोगशाला' मानते हैं कि अंतरिक्ष में नए ग्रह कैसे बनते और विकसित होते हैं।

  • इस सिस्टम में पहले से ही दो विशालकाय ग्रह Beta Pictoris b और Beta Pictoris c खोजे जा चुके थे।

  • अब Beta Pictoris d की खोज के बाद, यह ब्रह्मांड का ऐसा दूसरा सिस्टम बन गया है जिसमें कम से कम तीन ग्रहों की सीधे तौर पर पहचान की जा चुकी है।

"यह खोज पहले से ही बेहद दिलचस्प और रहस्यमयी सौरमंडल के एक और महत्वपूर्ण हिस्से को हमारे सामने लाती है। बीटा पिक्टोरिस हमेशा से हमारे लिए ग्रहों के जन्म को समझने की प्रयोगशाला रहा है।"

एडन गिब्स, मुख्य शोधकर्ता, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया (सैन डिएगो)

बृहस्पति से दोगुना बड़ा है यह नया ग्रह

वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक, नया खोजा गया ग्रह Beta Pictoris d बेहद विशालकाय है:

  • वजन: यह हमारे सौरमंडल के सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति (Jupiter) से कम से कम दोगुना भारी है।

  • दूरी: यह अपने तारे से करीब 30 एस्ट्रोनॉमिकल यूनिट (AU) की दूरी पर चक्कर लगा रहा है, जो हमारे सौरमंडल में सूर्य से नेपच्यून (Neptune) ग्रह की दूरी के बराबर है।

  • परिक्रमा क्षेत्र: यह अपने स्टार सिस्टम में मौजूद तीनों ज्ञात ग्रहों में सबसे चौड़ी कक्षा (Orbit) में चक्कर लगाता है।

बिना खोजे ही अचानक कैसे मिल गया नया ग्रह?

दिलचस्प बात यह है कि वैज्ञानिक इस नए ग्रह की तलाश नहीं कर रहे थे। 'कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी' के शोधकर्ता एडन गिब्स और उनकी टीम जेम्स वेब टेलीस्कोप के NIRSpec (Near-Infrared Spectrograph) उपकरण का उपयोग करके पहले से मौजूद ग्रह 'Beta Pictoris b' के वायुमंडल का अध्ययन कर रहे थे।

तभी स्पेक्ट्रोस्कोपिक डेटा में कार्बन मोनोऑक्साइड गैस के अवशोषण की रेखाएं (Absorption lines) दिखाई दीं, जो किसी बारकोड की तरह सजी हुई थीं। यह सिग्नल सीधे तौर पर एक विशाल गैस दानव (Gas Giant) ग्रह की उपस्थिति की ओर इशारा कर रहा था। बाद में जेम्स वेब के MIRI (Mid-Infrared Instrument) द्वारा की गई जांच में वहां पानी की भाप (Water Vapor) और मीथेन गैस भी पाई गई, जिससे इस ग्रह के होने की पुष्टि हो गई।

'कॉस्मिक फॉग' यानी धूल की धुंध को चीरकर हुई खोज

बीटा पिक्टोरिस स्टार सिस्टम चारों तरफ से अंतरिक्ष की धूल और मलबे की एक बेहद चमकीली डिस्क से घिरा हुआ है। यह धूल एक घने कोहरे की तरह काम करती है, जिसके कारण पारंपरिक कैमरे से इस ग्रह को देखना असंभव था।

लेकिन जेम्स वेब टेलीस्कोप की 'स्पेक्ट्रोस्कोपी' तकनीक ने इस धूल को दरकिनार करते हुए सीधे ग्रह के वायुमंडल के रसायनों को पकड़ लिया। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक से भविष्य में ब्रह्मांड के कई अन्य छिपे हुए ग्रहों की खोज का रास्ता साफ हो गया है।