{"vars":{"id": "125128:4947"}}

 बच्चों के गायब होने के पीछे देशव्यापी नेटवर्क तो नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगी रिपोर्ट

सभी राज्यों से डेटा जुटाने का निर्देश, अपहृत बच्चों के इंटरव्यू लेने का भी सुझाव; कोर्ट बोली— पैटर्न है या अलग-अलग घटनाएं, पता लगाए सरकार

 

नई दिल्ली। देशभर में लगातार सामने आ रही बच्चों के लापता होने की घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह यह पता लगाए कि इसके पीछे कोई राष्ट्रव्यापी नेटवर्क सक्रिय है या फिर अलग-अलग राज्यों में स्थानीय स्तर पर ऐसी घटनाएं हो रही हैं।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने कहा कि यह जानना बेहद जरूरी है कि बच्चों के गायब होने के मामलों में कोई एक समान पैटर्न है या फिर ये आपस में असंबंधित घटनाएं हैं। अदालत ने केंद्र सरकार से सभी राज्यों से इस संबंध में विस्तृत डेटा जुटाने को कहा है।

सभी राज्यों से मांगा गया पूरा ब्योरा

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्य भाटी ने बताया कि कुछ राज्यों ने बच्चों के लापता होने से जुड़ा डेटा उपलब्ध कराया है और कई मामलों की न्यायिक स्थिति की जानकारी भी दी गई है। हालांकि अब भी करीब एक दर्जन राज्यों से रिपोर्ट नहीं मिली है।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि बिना पूरे आंकड़ों के सही विश्लेषण संभव नहीं है। पीठ ने स्पष्ट किया कि जरूरत पड़ी तो डेटा नहीं देने वाले राज्यों के खिलाफ सख्त आदेश जारी किए जा सकते हैं।

अपहृत बच्चों के इंटरव्यू लेने का सुझाव

अदालत ने सरकार को यह सुझाव भी दिया कि जिन बच्चों को अपहरण के बाद सुरक्षित बरामद किया गया है, उनके इंटरव्यू लिए जाएं। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि इन घटनाओं को अंजाम देने वाले लोग कौन हैं और किस तरह काम कर रहे हैं।

पीठ ने कहा कि यह जानना आवश्यक है कि क्या इन मामलों के पीछे कोई संगठित गिरोह सक्रिय है या फिर ये अलग-अलग आपराधिक घटनाएं हैं।

“हर 8 मिनट में एक बच्चा गायब” रिपोर्ट से बढ़ी चिंता

गौरतलब है कि बीते साल 18 नवंबर को आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि भारत में हर 8 मिनट में एक बच्चा गायब हो जाता है। इसी रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लिया था।

इससे पहले 9 दिसंबर को अदालत ने गृह मंत्रालय को निर्देश दिया था कि वह पिछले छह वर्षों का देशव्यापी डेटा संकलित करे, ताकि यह पता चल सके कि कहां-कहां और कितने बच्चे लापता हुए हैं। कोर्ट ने यह भी कहा था कि पूरा डेटा महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाए।

 एनजीओ की याचिका पर हो रही है सुनवाई

यह मामला एक एनजीओ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया है। अदालत का कहना है कि बच्चों के लापता होने जैसी गंभीर समस्या से निपटने के लिए सरकार को ठोस तंत्र विकसित करना होगा, ताकि समय रहते कार्रवाई हो सके और ऐसे अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके।

अब सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार से सभी राज्यों का डेटा मिलने के बाद विस्तृत रिपोर्ट की प्रतीक्षा कर रहा है, जिसके आधार पर आगे के निर्देश जारी किए जाएंगे।