MLA-MLC पेंशन विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार से मांगा जवाब, 'लोक प्रहरी' की याचिका पर जारी हुआ नोटिस
पूर्व और मौजूदा विधायकों-विधान पार्षदों को भत्ते व पेंशन देने वाले 1980 के कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती; 4 हफ्ते में जवाब दाखिल करने का निर्देश
नई दिल्ली / भदैनी मिरर: उत्तर प्रदेश के मौजूदा और पूर्व विधायकों तथा विधान पार्षदों (MLA/MLC) को पेंशन, विभिन्न भत्ते और वित्तीय लाभ देने से जुड़े कानून की संवैधानिक वैधता का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत पहुंच गया है। गैर-सरकारी संगठन (NGO) 'लोक प्रहरी' की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश 'लोक प्रहरी' द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल (सदस्यों के वेतन-भत्ते और पेंशन) अधिनियम, 1980 के प्रावधानों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया था।
क्या हैं 'लोक प्रहरी' के मुख्य तर्क?
याचिकाकर्ता एनजीओ का कहना है कि राज्य विधानमंडल के पास अपने पूर्व सदस्यों और उनके परिजनों को पेंशन व अन्य वित्तीय लाभ देने की कोई संवैधानिक शक्ति नहीं है।
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संविधान का अनुच्छेद 195: याचिका में तर्क दिया गया कि अनुच्छेद 195 राज्य विधानमंडल को केवल मौजूदा सदस्यों के वेतन और भत्ते तय करने का अधिकार देता है; इसमें 'पेंशन' का कोई उल्लेख नहीं है।
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वित्तीय भार का मुद्दा: याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि 1952 में विधायकों को ₹200 का वेतन और सीमित भत्ते मिलते थे, जो अब बढ़कर ₹1,25,000 प्रति माह से अधिक हो चुके हैं। इसके अलावा मुफ्त यात्रा, आवास, चिकित्सा और अन्य सुविधाएं भी दी जा रही हैं, जो करदाताओं के पैसे का मनमाना इस्तेमाल है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की थी याचिका?
इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1980 के अधिनियम को वैध ठहराते हुए कहा था कि राज्य विधानमंडल के पास अपने सदस्यों व पूर्व सदस्यों के लिए सामाजिक सुरक्षा के उपाय करने का अधिकार है। हाईकोर्ट ने 2018 के सुप्रीम कोर्ट के ही एक फैसले का हवाला देते हुए माना था कि जनप्रतिनिधि एक अलग श्रेणी में आते हैं और उनके लाभ की मात्रा तय करना विधायी नीति का हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूपी सरकार को नोटिस जारी किए जाने के बाद अब इस महत्वपूर्ण नीतिगत और संवैधानिक मुद्दे पर शीर्ष अदालत के अगले रुख पर सभी की नजरें टिक गई हैं।