High Court Decision: केवल पैसे मिलना रिश्वत नहीं! हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला, बहाल होगा बर्खास्त सरकारी अफसर
हाई कोर्ट ने कहा कि जब तक यह साबित न हो कि पैसा किसी अवैध सरकारी लाभ के बदले लिया गया है, तब तक उसे 'घूस' नहीं माना जा सकता
नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के आरोपों को लेकर एक ऐतिहासिक स्पष्टीकरण दिया है। कोर्ट ने कहा है कि किसी लोक सेवक (Government Servant) के पास धन का पाया जाना तब तक 'रिश्वत' की श्रेणी में नहीं आता, जब तक यह सिद्ध न हो जाए कि वह राशि किसी काम को करने या अवैध पक्षपात करने के एवज में ली गई है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला केंद्रीय भंडारण निगम (CWC) के एक वरिष्ठ सहायक प्रबंधक से जुड़ा है। उन पर तीन गंभीर आरोप लगाए गए थे:
1. व्यापारियों से अवैध रिश्वत लेना (खासकर एक व्यापारी से खाते में 75 हजार रुपये प्राप्त करना)।
2. कार्य में लापरवाही और दुराचरण।
3. ड्यूटी के दौरान सोना और बिना अनुमति मुख्यालय छोड़ना।
इन आरोपों के आधार पर विभागीय जांच के बाद अधिकारी को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। इस निर्णय के खिलाफ अधिकारी ने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
हाई कोर्ट की सख्त और महत्वपूर्ण टिप्पणी
जस्टिस संजीव नरूला की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि केवल बैंक खाते में राशि ट्रांसफर होना भ्रष्टाचार का पुख्ता सबूत नहीं हो सकता। कोर्ट ने अपने आदेश में मुख्य बातें कहीं:
- उद्देश्य साबित करना अनिवार्य: पीठ ने स्पष्ट किया कि भले ही लोक सेवक ने उस धन के स्रोत का स्पष्टीकरण न दिया हो, लेकिन जांच एजेंसियों को यह साबित करना होगा कि यह पैसा किसी 'गलत सरकारी लाभ' पहुंचाने के बदले दिया गया था।
- अस्पष्टता का लाभ: यदि धन प्राप्त करने का उद्देश्य अस्पष्ट है, तो उसे स्वतः रिश्वत नहीं माना जा सकता।
नौकरी बहाली का आदेश
अदालत ने पाया कि भ्रष्टाचार का मुख्य आरोप टिकाऊ नहीं था। अन्य आरोपों (जैसे ड्यूटी पर सोना या प्रशासनिक लापरवाही) पर कोर्ट ने कहा कि ये इतने गंभीर नहीं हैं कि किसी कर्मचारी को सेवा से हटाने जैसी कठोर सजा दी जाए।
दिल्ली हाई कोर्ट ने अधिकारी को सेवा से हटाने के आदेश को रद्द करते हुए उन्हें तत्काल बहाल करने का निर्देश दिया है। साथ ही, कोर्ट ने अधिकारी को निरंतर सेवा लाभ (Continuity of Service) प्रदान करने का भी आदेश दिया है।