संसद मार्च के दौरान पत्रकारों के खिलाफ नाराजगी से गर्माया माहौल: गोदी मीडिया बनाम स्वतंत्र पत्रकारिता पर आपस में भिड़े पत्रकार
प्रदर्शनों में मीडिया को टारगेट करने पर सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस; पूनम पांडे और विजेता सिंह ने टीवी रिपोर्टरों के बचाव में उठाई आवाज।
नई दिल्ली / भदैनी मिरर: देश और दुनिया में बड़े विरोध-प्रदर्शनों के दौरान मीडिया संस्थानों और पत्रकारों का प्रदर्शनकारियों के निशाने पर आना अब एक आम प्रवृत्ति बनती जा रही है। नेपाल के जेन ज़ी (Gen Z) विरोध प्रदर्शनों के दौरान प्रसिद्ध अखबार 'कांतिपुर' के कार्यालय में तोड़फोड़-आगजनी हो या बांग्लादेश में 'द डेली स्टार' के दफ्तर को निशाना बनाना—मीडिया के प्रति आम जनता की नाराजगी की झलक हाल ही में भारत की राजधानी दिल्ली में भी देखने को मिली।
20 जुलाई को आयोजित 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों के बीच मीडिया को लेकर गहरा असंतोष और गुस्सा साफ नजर आया। भारत में पिछले कुछ सालों से मीडिया की भूमिका, उसकी निष्पक्षता और टीवी चैनलों के अति-ध्रुवीकरण को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।
गोदी मीडिया का ठप्पा और ध्रुवीकृत माहौल
प्रदर्शन स्थल पर कुछ विशिष्ट टीवी न्यूज चैनलों और उनके रिपोर्टरों के खिलाफ लोगों ने सीधे तौर पर नारेबाजी की। हालांकि, इस दौरान स्थिति तब और असहज हो गई जब कुछ ऐसे रिपोर्टर भी भीड़ के गुस्से का शिकार बन गए जिनकी छवि निष्पक्ष या सरकार-विरोधी मानी जाती है।
इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर यह बहस तेज हो गई है कि क्या किसी चैनल या विचारधारा से असहमति के कारण ग्राउंड पर काम कर रहे संवाददाताओं को टारगेट करना जायज है?
"गुस्सा सही जगह निकलना चाहिए": वरिष्ठ पत्रकारों का रुख
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (X) पर इस मुद्दे को लेकर वरिष्ठ पत्रकारों के बीच तीखी चर्चा और वैचारिक मतभेद देखने को मिले:
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पूनम पांडे (वरिष्ठ पत्रकार): प्रदर्शन के दौरान रिपोर्टर के साथ हुई बदसलूकी का वीडियो साझा करते हुए उन्होंने लिखा, "मीडिया से नाराजगी स्वाभाविक हो सकती है, लेकिन सीधे ग्राउंड रिपोर्टर को टारगेट करना किसी भी तरह सही नहीं है। धूप हो या बरसात, ग्राउंड पर उतरकर मेहनत रिपोर्टर ही करता है। जनता को अपनी नाराजगी सही मंच और सही जगह पर व्यक्त करनी चाहिए।"
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विजेता सिंह (डिप्टी एडिटर, द हिंदू): पूनम पांडे के विचार का समर्थन करते हुए विजेता सिंह ने कहा, "टीवी स्टूडियो में बैठकर नफरत या पक्षपात फैलाने वाले एंकरों/प्रजेंटरों और जमीन पर दिन-रात मेहनत करने वाले फील्ड रिपोर्टरों के बीच अंतर समझना बेहद जरूरी है। अधिकांश टीवी रिपोर्टर बेहद मेहनती होते हैं और केवल अपना काम कर रहे होते हैं।"
मीडिया की साख पर उठते गंभीर सवाल
संसद मार्च के दौरान घटी इस घटना ने एक बार फिर भारतीय मीडिया के घटते विश्वास और स्टूडियो जर्नलिज्म बनाम ग्राउंड जर्नलिज्म के बीच की खाई को उजागर कर दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि टीवी न्यूज घरानों ने अपनी कार्यशैली और निष्पक्षता पर आत्ममंथन नहीं किया, तो भविष्य में ग्राउंड रिपोर्टिंग करना पत्रकारों के लिए और चुनौतीपूर्ण हो सकता है।