{"vars":{"id": "125128:4947"}}

सोनभद्र: मासूम बहनों का शोषण करने वाले दोषी को मिली 'आखिरी सांस तक' जेल की सजा, 4 महीने में आया कोर्ट का फैसला

'गुड टच-बैड टच' से खुला था 1 साल से चल रहा अत्याचार

 

सोनभद्र जिले के अनपरा थाना क्षेत्र से जुड़े मासूम बहनों के लैंगिक उत्पीड़न के मामले में पॉक्सो कोर्ट (POCSO Court) ने एक मिसाल पेश करने वाला ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। दो सगी मासूम बहनों के साथ यौन उत्पीड़न करने वाले दोषी इलेक्ट्रीशियन को अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (विशेष न्यायाधीश पॉक्सो) ओमकार शुक्ल की अदालत ने जीवन की अंतिम सांस तक (प्राकृत जीवन काल) जेल में रहने की सजा सुनाई है। इसके साथ ही दोषी पर 73 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है।

न्यायालय ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए आरोप तय होने के महज 4 माह और 4 दिन के भीतर सभी 8 गवाहों की गवाही पूरी कराकर इस त्वरित न्याय को अंजाम दिया।

'गुड टच-बैड टच' से खुला था 1 साल से चल रहा अत्याचार

यह पूरा मामला तब प्रकाश में आया था जब स्कूल में शिक्षिका द्वारा बच्चों को दिए जा रहे 'गुड टच और बैड टच' (Good Touch - Bad Touch) के पाठ के दौरान 7 और 9 साल की दो मासूम बहनों ने अपने साथ हो रहे अत्याचार की बात समझी और घर जाकर परिजनों को जानकारी दी।

जांच में सामने आया कि झारखंड के बिकताम (थाना मेराल) का रहने वाला फैयाज उर्फ फैज अनपरा के अशोक नगर में रहकर इलेक्ट्रीशियन का काम करता था। वह परिजनों के विश्वास का फायदा उठाकर घर में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण ठीक करने के बहाने आता-जाता था। करीब एक साल से वह मासूम बच्चियों को बहला-फुसलाकर छत पर ले जाकर अश्लील हरकतें और लैंगिक उत्पीड़न कर रहा था। मां की तहरीर पर पुलिस ने मामला दर्ज कर तत्काल चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की थी।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी: "विश्वासघात करने वाले को राहत नहीं"

सजा पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने कम सजा की गुहार लगाई, लेकिन अदालत ने उसे सिरे से खारिज कर दिया। पॉक्सो कोर्ट के न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि दोषी ने परिवार के वर्षों पुराने विश्वास का गलत इस्तेमाल किया है। उसने न केवल मासूम बच्चियों की निजता भंग की, बल्कि परिवार के सदस्यों पर भी झूठे आरोप लगाए। अपराध की क्रूर प्रकृति को देखते हुए दोषी को किसी भी तरह की रियायत देना न्यायसंगत नहीं होगा।

क्या होती है 'अंतिम सांस तक कारावास' की सजा?

विशेष लोक अभियोजक दिनेश अग्रहरि ने इस सजा के कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि सामान्य आजीवन कारावास में दोषी के अच्छे आचरण या उम्रदराज होने पर सरकार सजा कम या माफ कर सकती है। लेकिन 'शेष प्राकृत जीवन काल' (Rest of Natural Life) के कारावास में दोषी को अपनी आखिरी सांस तक जेल में ही रहना पड़ता है, जिसमें किसी भी प्रशासनिक छूट का प्रावधान नहीं होता।

सोनभद्र जिले में बाल यौन शोषण के मामले में इतनी कम अवधि (4 महीने) में अंतिम सांस तक की सजा सुनाए जाने का यह पहला मामला है, जिसकी पूरे इलाके में सराहना हो रही है।