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बिहार-झारखंड के 25 साल पुराने कर्मचारियों के बकाया मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: दिहाड़ी मजदूरों को मिलेगा ₹1 लाख का मुआवजा

बिहार पुनर्गठन के बाद बंद हुए 5 राज्य निगमों के कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत; EPF बकाये पर 12% और देरी से मिले वेतन पर 6% ब्याज देने का निर्देश।

 

भदैनी मिरर डिजिटल डेस्क: बिहार पुनर्गठन अधिनियम 2000 के बाद से चले आ रहे राज्य के 5 बंद पड़े निगमों के कर्मचारियों और मजदूरों के बकाये से जुड़े 25 साल पुराने विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बेहद अहम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने बिहार और झारखंड दोनों सरकारों को निर्देश दिया है कि वे बंद हो चुके अंतर-राज्यीय निगमों के प्रत्येक प्रभावित दिहाड़ी कर्मचारी और मजदूर को एकमुश्त 1,00,000 (एक लाख) रुपये का मुआवजा दें।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए देरी से दिए जाने वाले ईपीएफ (EPF) बकाये पर 12% वार्षिक साधारण ब्याज और देरी से मिले वेतन व अन्य मौद्रिक बकाये पर 6% ब्याज का भुगतान करने का भी आदेश दिया।

क्या था पूरा मामला और कैसे शुरू हुआ विवाद?

वर्ष 2000 में तत्कालीन बिहार राज्य के पुनर्गठन और झारखंड के गठन के बाद 5 बड़े राज्य निगमों—बिहार राज्य निर्माण निगम लिमिटेड, बिहार राज्य औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड, बिहार राज्य इलेक्ट्रॉनिक विकास निगम लिमिटेड, बिहार राज्य वन विकास निगम लिमिटेड और बिहार राज्य पंचायती राज वित्तीय निगम लिमिटेड के कर्मचारियों और मजदूरों के दायित्वों व देनदारियों के बंटवारे को लेकर कानूनी विवाद खड़ा हो गया था। 'कपिला हिंगोरानी बनाम बिहार राज्य' मामले से शुरू हुई यह कानूनी लड़ाई लंबे समय से अदालतों में लंबित थी।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 29 मई, 2026 को पूर्व जज जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की समिति की रिपोर्ट की सिफारिशों को स्वीकार किया था। इसके बाद अगस्त 2026 में दोनों राज्यों ने हलफनामा दाखिल कर बताया कि कुल 2,274 सत्यापित कामगारों में से 2,074 लोगों को बकाया दिया जा चुका है, जबकि लगभग 200 दावेदारों के दस्तावेज या पते न मिलने के कारण मामला अटका था।

अदालत ने खारिज की 42.50 रुपये की पुरानी दिहाड़ी दर

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों की उस गणना को पूरी तरह से खारिज कर दिया, जिसमें 1992 के बाद से मजदूरों के बकाये का हिसाब लगाने के लिए 42.50 रुपये प्रति दिन की एक समान पुरानी दर का इस्तेमाल किया जा रहा था।

पीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा:

"कामगारों का दिहाड़ी मजदूर होना उन्हें नियमित कर्मचारियों से अलग जरूर करता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि समय बीतने के बाद भी उनकी सेवाओं की मौद्रिक कीमत वही तय रखी जाए। 1992 के बाद से इतने लंबे समय तक 42.50 रुपये की निश्चित दर से हिसाब लगाना पूरी तरह अनुचित है।"

गैर-मौजूद दावेदारों और कानूनी वारिसों के लिए 12 महीने की छूट

सर्वोच्च अदालत ने सामान्य पहचान और सत्यापन प्रक्रिया को अब बंद कर दिया है, लेकिन उन कर्मचारियों और उनके कानूनी वारिसों के हक को सुरक्षित रखा है जो अब तक संपर्क नहीं कर पाए थे। कोर्ट ने आदेश दिया है कि ऐसे दावेदार फैसले की तारीख से 12 महीने के भीतर आवश्यक दस्तावेजों के साथ संबंधित नोडल अधिकारी के समक्ष अपना दावा पेश कर सकते हैं। जांच के बाद उनके भी बकाये और मुआवजे का भुगतान किया जाएगा।