कार्रवाई ऐसी हो जो नजीर बने

                             

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अफसरों से लेकर कर्मचारियों तक इतने पगार तो दिए ही जाते हैं जिससे वह सुख सुविधाओं के साथ अपनी जिंदगी यापन कर सकता है। जब अफसर ही भ्रष्टाचार में लिप्त होंगे तो कर्मचारियों पर लगाम कैसे लगेगी? जब पुलिस ही भ्रष्टाचार और अपराधियों का संरक्षण करेगी तो आखिर सरकार के अपराध मुक्त का नारा साकार कैसे होगा? पुलिस विभाग के अफसरों व कर्मचारियों तक यह जानते है कि भ्रष्टाचार व अनियमितता में पकड़े जाने के बाद निलंबन और उसके बाद विभागीय जांच की रश्मअदायगी के बाद पुनः तैनाती मिलनी ही है

अवनिन्द्र कुमार सिंह – सम्पादक भदैनी मिरर

कोरोना संक्रमण काल के बाद खुल रहे बाजारों और सड़कों पर पुलिसिया हस्तक्षेप कम होने के बाद बढ़ती आपराधिक घटनाएं चिंता का कारण बनी हुई है। हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा एसएसपी प्रयागराज और पुलिस अधीक्षक महोबा के विरुद्ध की गई कार्यवाई सराहनीय है। इससे पुलिस विभाग में निःसंदेह कड़ा संदेश गया होगा, जिससे अन्य जनपदों के अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले अनियमितता पर  लगाम लगेगी। पुलिस विभाग के अफसरों व कर्मचारियों तक यह जानते है कि भ्रष्टाचार व अनियमितता में पकड़े जाने के बाद निलंबन और उसके बाद विभागीय जांच की रश्मअदायगी के बाद पुनः तैनाती मिलनी ही है।

पुलिस अधीक्षक महोबा और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक प्रयागराज पर गम्भीर आरोप थे, उन पर अनियमितताएं बरतने तथा शासन व पुलिस मुख्यालय के निर्देशों का पालन सही ढंग से नहीं करने के साथ ही पोस्टिंग में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के आरोप भी लगे थे। निर्देशों के अनुरूप नियमित तौर पर पेट्रोलिंग किए जाने बैंकों तथा आर्थिक व्यवसायिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा और बाइकर्स द्वारा की जा रही लूट की घटनाओं की रोकथाम में भी उन्होंने अपेक्षित कार्यवाही नहीं की। चेकिंग और निरीक्षण भी सही ढंग से नहीं किया इस वजह से प्रयागराज में तीन महीनों के दौरान लंबित विवेचनाओं में भी लगातार वृद्धि होती चली गई। कोरोना महामारी को लेकर शासन और पुलिस मुख्यालय की ओर से शारीरिक दूरी बनाए रखने के निर्देशों का भी उन्होंने सही तरीके से पालन नहीं कराया इस पर हाईकोर्ट ने घोर नाराजगी भी जताई थी। जगजाहिर था कि ऐसे अधिकारियों पर कार्यवाई होगी। पुलिस अधीक्षक महोबा ने तो गिट्टी लदी गाड़ियों के अवैध परिवहन को प्रोत्साहन दिया गया और सुविधा शुल्क मांगी गई। ना देने पर वाहन स्वामियों का पुलिस द्वारा उत्पीड़न कराया गया। जिम्मेदार पदों पर आसीन ऐसे अफसरों का आचरण गैर जिम्मेदाराना तो है ही साथ ही घोर निंदनीय भी।

यक्ष प्रश्न यह कि सरकार द्वारा अफसरों से लेकर कर्मचारियों तक इतने पगार तो दिए ही जाते हैं जिससे वह सुख सुविधाओं के साथ अपनी जिंदगी यापन कर सकता है। जब अफसर ही भ्रष्टाचार में लिप्त होंगे तो कर्मचारियों पर लगाम कैसे लगेगी? जब पुलिस ही भ्रष्टाचार और अपराधियों का संरक्षण करेगी तो आखिर सरकार के अपराध मुक्त का नारा साकार कैसे होगा? आखिर आम जनता का सरकारी महकमे पर विश्वास कैसे बढ़ेगा, आम जनता की समस्याओं का निस्तारण कैसे होगा? जब किसी अधिकारी पर आरोप लगे तो उन्हें कानून के दायरे में लाकर विधिवत जांचोपरान्त कठोर कार्रवाई होनी चाहिए ताकि ऐसी घटनाओं पर न केवल लगाम लग सके बल्कि भविष्य में नजीर के तौर पर पेश किया जा सके। यह भी तय है कि सरकार की छवि बनाने और बिगाड़ने में नौकरशाहों की बड़ी भूमिका होती है। जब नौकरशाह बेलगाम होंगे तो सरकार की छवि धूमिल होने से रोका नहीं जा सकता। उम्मीद की जानी चाहिए थी अफसर सरकार की इस कार्रवाई से सीख लेंगे और अपने काले कारनामों से बाज आएंगे।


             

         

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